आर्थिक नीति पर स्वामी ने उठाए सवाल- नहीं आई नई नीति तो 5 ट्रिलियन का सपना रह जाएगा अधूरा!

  • by Yogesh
  • August 31, 2019

देश की विकास दर में गिरावट आने पर हाल ही में भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सरकार नई आर्थिक नीति पर सवाल उठाए हैं, सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि,

“नई आर्थिक नीति के बिना 5 ट्रिलियन इकोनॉमी संभव नहीं है, केवल साहस या केवल ज्ञान से ही अर्थव्यवस्था को नहीं बचा सकते, इसके लिए दोनों की जरूरत है, आज हमारे पास दोनों में से कोई भी नहीं है।,”

गौरतलब है कि देश की विकास दर में गिरावट दर्ज हुई है, पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में देश की विकास दर 5.8 फीसदी से घटकर 5 फीसदी हो गई है। वहीं अगर वार्षिक आधार पर जीडीपी की तुलना करें तो इस साल लगभग 3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। जो कि पिछले साल पहले इसी तिमाही में 8 फीसदी थी, पिछली तिमाही में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की गतिविधियों में गिरावट और कृषि उत्पादन में कमी का जीडीपी ग्रोथ पर ज्यादा असर हुआ हैं।

लगभग 7 साल पहले यूपीए सरकार में वित्‍त वर्ष 2012-13 की पहली तिमाही में जीडीपी के आंकड़े 4.9 फीसदी के निचले स्‍तर पर थे।

बता दें कि RBI ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए भारत की जीडीपी का अनुमान घटाकर 6.9 फीसदी किया है, पहले चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी 7 फीसदी रहने का अनुमान रखा गया था, आंकड़ों के अनुसार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पिछले वित्त वर्ष (2018-19) के 12.1 फीसदी की तुलना में महज 0.6 फीसदी की दर से आगे बढ़ा हैं, वहीं एग्रीकल्चर और फिशिंग सेक्टर पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही के 5.1 फीसदी की तुलना में 2 फीसदी की दर से आगे बढ़ा है।

बहरहाल, सरकार ने शुक्रवार जीडीपी में आई कमी को इसे दूर करने और देश में विश्वस्तरीय बैंक बनाने की दिशा में बड़ी पहल करते हुए सार्वजनिक क्षेत्र के 10 बैंकों का विलय कर चार बड़े बैंक बनाने की घोषणा की हैं। सरकार को उम्मीद है कि उसकी इस पहल से आर्थिक वृद्धि को गति मिलेगी और देश को 5,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में मदद मिलेगी।

बता दें कि पिछले हफ्ते कर प्रोत्साहन उपायों की घोषणा करने वाली वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने शुक्रवार को बैंकों के विलय का ऐलान किया था, उन्होंने यह घोषणा जीडीपी की पहली तिमाही के वृद्धि दर का आंकड़ा आने से ठीक पहले की थी। इसके मुताबिक 2019-20 की पहली तिमाही में जीडीपी वृद्धि दर 5 प्रतिशत रही जो कि पिछले 6 सालों में सबसे न्यूनतम स्तर पर है।

गौरतलब है कि बैंकों में प्रस्तावित इस विलय के बाद सरकारी बैंकों की संख्या घटकर 12 रह जाएगी, वर्ष 2017 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या 27 थी।

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