चुनाव आयोग का बड़ा फ़ैसला, कहा सभी पार्टियां चुनाव आयोग को दें मिलें चंदें और दानकर्ताओं के नाम संबंधी जानकारियां

  • by Ashutosh Kumar Singh
  • April 12, 2019

आपको शायद हो मोदी सरकार कुछ समय पहले राजनैतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड नामक एक प्रक्रिया शुरू की थी। सरकार का दावा था कि इससे राजनैतिक दलों को मिलने वाले चंदे को लेकर पारदर्शिता आएगी।

लेकिन इसमें एक नियम यह भी है कि इसके जरिये मिलने वाले चंदें में चंदा देने वाले का नाम सार्वजानिक नहीं किया जाएगा। और अब इसी को लेकर याचिकाकर्ता एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स और चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करते हुए कहा था कि सरकार को नाम न सार्वजानिक करने वाले नियम में बदलाव करना चाहिए।

इससे सरकार की कालेधन को मिटाने वाली मंशा को ही खतरा है और साथ ही इससे यह पता ही नहीं लगाया जा सकता की राजनैतिक दल को चंदा कहाँ से मिला? ऐसे में भला प्रक्रिया को पारदर्शी कैसे ठहराया जा सकता है?

हम आपको बता दें कि गुरुवार को इस मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट में केंद्र सरकार का पक्ष रखने वाले अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा कि मतदाताओं को ये जानने का अधिकार नहीं है कि राजनीतिक दलों को पैसे कहां से मिलते हैं?

दरसल इस याचिका में जहाँ एक ओर सरकार इलेक्टोरल बॉन्ड देने वालों की गोपनीयता को बरक़रार रखना चाहती है वहीँ चुनाव आयोग पारदर्शिता के लिहाज़ से दानकर्ताओं के नाम सार्वजनिक किए जाने के पक्ष में फ़ैसला चाहता है।

और अब देश की सुप्रीम अदालत ने एक बड़ा फ़ैसला सुनाते हुए देश के सभी राजनीतिक दलों को यह निर्देश दिया है कि वह 30 मई तक सीलबंद लिफाफे में प्राप्त किए गए इलेक्टोरल बॉन्ड की राशि और इसके दानकार्ताओं की जानकारी दें। हालाँकि यह जानकारी चुनाव आयोग के पास गोपनीय रहेगी। 

इस फैसले को सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने कहा था,

“इलेक्टोरल बॉन्ड को यदि चुनावी चंदे को पारदर्शी बनाने के लिए लाया गया है, लेकिन साथ ही अगर इसमें चंदा देने वाले की पहचान गोपनीय रखी जा रही है, तो भला काले धन पर रोक लगाने की कोशिश को सरकार कैसे अंजाम देना चाहती है?”  

हालाँकि इस बीच जजों की पीठ ने इस मामले को लेकर कोई अंतिम फैसला अभी नहीं सुनाया है, अदालत के अनुसार यह फ़ैसला एक विस्तृत सुनवाई के बाद लिया जाएगा। ताकि चुनावों के दौरान किसी पार्टी विशेष को इसका लाभ न मिल सके।

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