February 16, 2019

2014 के मुक़ाबले आखिर कितनी मजबूत या कमजोर हुई है कांग्रेस की स्थिति? – विशेष कलम से

  • by विशेष कलम से
  • February 11, 2019

हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी वसंत ऋतु की शुरुआत हो चुकी है। हल्की ठंड के साथ मीठी मीठी धूप सबको लुभा रही है। परंतु 2019 की वसंत ऋतु में कुछ खास है, 2019 लोकसभा चुनाव का साल है। जी हां! इस बार कि वसंत में चुनाव की मिलावट है।

घर के आंगन में, घर के बाहर, घर के छत पर, गलियों में, चाय की टपरीयों पर, बस ट्रेन में, सब जगह चुनाव की बात हो रही है। सिर्फ इसी बात की चर्चा है कि कौन जीतेगा।

भारतवर्ष विविधताओं का देश है। यहां पर चुनाव को भी पर्व की तरह मनाया जाता है। चुनावी मौसम में छोटे बच्चों से लेकर युवाओं तक, गृहिणियों से लेकर वृद्धों तक, सभी चुनावी विचारधारा में रम जाते हैं। यही तो है भारतीय संविधान की शक्ति, ऐसा सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि यहां के जनमानस को यहां के संविधान और यहां की चुनावी प्रक्रिया में पूरा विश्वास है।

तो कौन जीतेगा 2019 का यह चुनाव?, किसे जनता अपने सर आंखों पर बिठाएगी?, कौन बनेगा भारत का सिरमौर? और क्या सत्ताधारी पक्ष बीजेपी फिर से अपना कार्यकाल दोहरा पाएगी? या फिर मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को जनता अवसर देगी? या एक अलग तरीके का ही समीकरण जिसे तीसरा मोर्चा या महागठबंधन कहा जा रहा है वह बाजी मार ले जाएगी जाएगी? ऐसे कई सवाल हमारे सामने हैं। लेकिन इन सब के बीच एक चीज़ बेशक ही महत्वपूर्ण होने वाली है और वह है मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की भूमिका।

जी हाँ! इसलिए यहाँ हम बात करेंगे मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की आगामी चुनावों में रहने वाली भूमिका की।

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस अपने 10 साल के उपलब्धियों के साथ चुनावी मैदान में उतरी थी। जहां तक बात है कांग्रेस (यूपीए) शासनकाल के 10 साल की उपलब्धियों की, तो अगर हम उसको भ्रष्टाचार, लूटतंत्र, घोर निराशावाद और महंगाई के पैमाने पर मापे, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

यही कारण था कि देश की जनता जनार्दन ने भारतीय जनता पार्टी को एक तरफा बहुमत देने का निर्णय किया था। लेकिन कहते हैं न राजनीति में कुछ भी निश्चित नहीं होता, समय के साथ-साथ राजनीतिक समीकरण भी बदलते हैं। इसी सोच के साथ कांग्रेस पार्टी भी इस चुनाव में अपने दावेदारी पेश करती नज़र आएगी।

यह चुनाव जितना खास कांग्रेस पार्टी के लिए है, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण उनके उनके राष्ट्रीय अध्यक्ष और तथाकथित युवा नेता माननीय राहुल गांधी जी के लिए भी है, क्योंकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के नाते यह उनका पहला लोकसभा चुनाव साबित होगा।

ऐसा इसलिए क्योंकि उनका प्रदर्शन ही उनके राजनीतिक भविष्य को तय करेगा। संगठनात्मक तौर पर देखें तो राहुल जी के अध्यक्ष पद पर उनके प्रदर्शन का कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है क्योंकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अगुवाई कोई गैर नेहरू गांधी परिवार से करें यह अभी आम जनमानस के लिए कल्पना से परे है।

लेकिन सह तो साफ़ है कि इन चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन यह निर्धारित करेगा कि आम जनमानस कि पार्टी के साथ ही साथ उसके अध्यक्ष के प्रति सोच क्या है और आम जनता उन पर और उनके नेतृत्व पर कितना भरोसा करती है।

आम चुनाव में उतरने से पहले कांग्रेस पार्टी ने प्रियंका वाड्रा के तौर पर अपना ट्रंप कार्ड खेला है। वैसे तो प्रियंका वाड्रा जी पहले भी अप्रत्यक्ष तौर पर चुनावों में उतरती थी और पार्टी का प्रचार-प्रसार करती थी लेकिन अब वह प्रत्यक्ष तौर पर चुनाव में उतरेंगी। क्यूँकि कांग्रेस पार्टी ने उन्हें अपना राष्ट्रीय महामंत्री बना दिया है। वैसे इसके चलते कांग्रेसी कार्यकर्ताओं में उत्साह की लहर है।

आज प्रियंका वाड्रा जी की लखनऊ में रैली भी है। जगह जगह पर नारे लग रहे हैं, “चलेगी बदलाव की आंधी, आ गए हैं राहुल और प्रियंका गांधी”। निश्चित तौर पर यह कहा जा सकता है कि प्रियंका वाड्रा के पार्टी में शामिल होने से कार्यकर्ताओं का अपार उत्साह वर्धन हुआ है। काफी समय से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की यह मांग थी कि प्रियंका वाड्रा जी को प्रत्यक्ष तौर पर राजनीति में आना चाहिए। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि प्रियंका वाड्रा इंदिरा जी का स्वरूप हैं, और वह सत्ताधारी दल को जड़ से उखाड़ फेकेंगी।

परंतु क्या स्वयं कांग्रेस पार्टी को प्रियंका वाड्रा जी पर इतना भरोसा है जितना वह जता रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि राष्ट्रीय महामंत्री होने के नाते प्रियंका वाड्रा जी को सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश का चुनावी संयोजक बनाया गया है। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि कांग्रेस पार्टी को भी लगता है कि प्रियंका वाड्रा की पहुंच केवल हिंदी भाषी क्षेत्र तक ही सीमित है। प्रियंका वाड्रा के आने से कार्यकर्ताओं का जो उत्साहवर्धन हुआ है वह वोटों में कितना तब्दील होगा, यह तो वक्त ही बताएगा।

जहां तक बात है कांग्रेस पार्टी के मजबूत होने की तो विगत 5 वर्षों में हुए विधानसभा चुनाव की हार ने यह साबित किया है कि कांग्रेस पार्टी पर से जनता का विश्वास कम हुआ है। हाल ही में हुए मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, और राजस्थान के चुनाव को छोड़ दिया जाए तो बीते लगभग सभी चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार हुई है।

कांग्रेस पार्टी की कमजोरी इस बात से भी साबित होती है कि वह अपने पार्टी को मजबूत करने के बजाय अपने गठबंधन को मजबूत करने में लगी हुई है। उसकी सारी की सारी रणनीति गठबंधन आधारित है। कांग्रेस पार्टी महीनों से महागठबंधन की रूपरेखा बनाने में लगी हुई है, परंतु सपा, बसपा और तृणमूल जैसे बड़े क्षेत्रीय दल कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व को अपनाएंगे, इसमें अभी संदेह है।

महागठबंधन में कांग्रेस पार्टी का जो सबसे बड़ा रोड़ा बन कर सामने आया है वह है तृणमूल कांग्रेस। ममता बनर्जी ने समय-समय पर विभिन्न माध्यमों से अपने प्रधानमंत्री बनने की दिली इच्छा को जग जाहिर किया है और इससे निपटने में कांग्रेस पार्टी असफल रही है।

हाल ही में ममता बनर्जी के सीबीआई के खिलाफ धरना प्रदर्शन में विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उनके साथ मंच साझा किया परंतु राहुल गांधी इस मंच का हिस्सा नहीं बने। उन्होंने बस ट्विटर पर उनको समर्थन दे दिया। ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी जी को ‘कांप्लेक्स फीलिंग’ हो रही हो जो कि उनकी कमजोरी को दर्शाता है। महागठबंधन भी कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ी कसौटी है जिस पर वह कितना खरा उतरेगी इसका फैसला तो जनता के हाथों में है।

लेकिन जाहिर तौर पर चुनावों परिणामों के बारे में कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी। वैसे भी भारतवर्ष की सबसे पुरानी पार्टी, भारत के मुख्य विपक्षी पार्टी, जिसके पास सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा जैसे बड़े नाम है उसका चुनाव में कैसा प्रदर्शन होगा यह तो जनता जनार्दन और वक्त ही बताएगा।

धन्यवाद…!

आदित्य जायसवाल  
समाज कार्य विभाग,
लखनऊ विश्वविद्यालय

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *